Ek Nazm

सन्नाटा

                 
सन्नाटा कैसे मिलेगा इस बोलती हुई दुनिया में ,
यहाँ एक दुनिया बोलती है, एक दुनिया सुनती है,
पर समझ कोई भी दुनिया नहीं पाती,

यहाँ चिड़िया बनकर बोलती है सुबह, और गाने सुनाती है हमको शाम ,
ये रात भी फिर कहाँ चुप रहती, पुकारती है वह चाँद का नाम ,
सोचा की आसमान को ताक कर सो जाते अगर बादल ना बोलते पानी बनकर,
माँ के आँचल में खो जाते अगर अना ना बोलती जवानी बनकर,

और आँख लगी तो हंगामा था सपनो का मेरे मन में ,
जैसे चींखते है नेता मंच पर , मगर नींद खुली तो सब गायब था ,
सब गायब था

सन्नाटा ढूंढने निकला जब फिर मैं एक सफर पर,
बोलने लगी फिर परछाई भी मेरी मुझसे,
कि खुशनुमा था मेरा हमसफ़र का रिश्ता तुझसे,

याद आया की खामोश तो हम भी बैठा करते थे,
पर कितना मुझसे  बोलती थी तेरी आँखे,
तेरी आँखे थी कि सन्नाटा गहरा ?
गहरा है अंधेरा या सन्नाटा गहरा,
खामोश करने लगा फिर मुझे सन्नाटा मेरा,

सोचता हूँ सन्नाटा कैसे मिलेगा इस बोलती हुई दुनिया मे

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